7:25 PM
प्रश्न उठा
???????
दुख का सागर
है अपार
कठिन है
पाना इसका पार

समाधान गुना
छोड़
कश्ती को मझधार

अपना ले लहरों को
कर
तूफानों से प्यार
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धरती

11:05 PM


धरती






तितली भौंरे इस पर झूमें
रोज हवाएं इसको चूमें
चंदा इसका भाई चचेरा
बादल के घर जिसका डेरा
रोज लगाती सूरज फेरा
रात कहीं है, कहीं सवेरा
पर्वत, झील, नदी, झरने
नित पड़ते पोखर भरने
लोमड़, गीदड़ शेर-बघेरे
करते निशि-दिन यहां चुफेरे
बोझ हमारा जो है सहती
वही हमारी प्यारी धरती
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मैं हूँ उसकी हीर

3:29 PM
1
मन् लोभी मन लालची,मन चंचल मन चोर
मन के हाथ सभी बिके,मन पर किस का जोर

तेरे मन ने जब कही,मेरे मन् की बात
हरे-हरे सब हो गये,साजन पीले पात


जिसका मन अधीर हुआ,सुनकर मेरी पीर
वो है मेरा राँझना, मैं हूँ उसकी हीर


तेरे मन पहुंची नहीं,मेरे मन की बात
नाहक हमने थे लिये,साजन फ़ेरे सात्


वो बैरी पूछै नहीं ,अब तो मेरी जात
जिसके कारण थे हुए,सारे ही उत्पात


सुनले साजन आज तू,एक पते की बात
प्यार कभी देखे नहीं.दीन-धरम या जात


मन की मन ने जब सुनी. सुन साजन झनकार
छनक् उठी पायल तभी,खनके कंगन हजार

मन फकीर है दोस्तो,मन ही साहूकार
मुझ में रह उनका हुआ,मन् ऐसा फनकार


मन की मन से जब हुई,साजन थी तकरार
जीत सका तू भी नहीं,गई तभी मैं हार
१०
मन की करनी देखकर.बौरा गया दिमाग
संबंधों में लगी तभी,बैरन कैसी आग ?
११
मनवा जब समझा नहीं,प्रीत प्रेम का राग
संबंधों घोड़े चढ़ा था,तभी बैरी दिमाग
१२
मन की हारे हार है,सभी रहे समझाय
समझा,समझा सब थके,मनवा समझे नाय

१३
मन की लागी आग तो ,वो ही सके बुझाय
जिसके मन् में,दोस्तो , प्रीत अगन लग जाय
१४
प्रीतम के द्वारे खड़ा,मनवा हुआ अधीर
इतनी देर लगा रहे,क्या सौतन है सीर
१५
मन औरत ,मन मरद भी,मन बालक नादान
नाहक मन के व्याकरण,ढूंढ़े सकल जहान
१६
मन तुलसी मीरा भया,मनवा हुआ कबीर
द्रोपदी के श्याम-सखा,पूरो म्हारो चीर
१७
अंगरलियां जब मन करे,महक उठे तब गात
सहवास तो है दोस्तो,बस तन की सौगात
१८
मन की मन से जब हुई,थी यारो तकरार
टूट गये रिश्ते सभी,सब् बैठे लाचार
१९
मन की राह अनेक हैं, मन के नगर हजार
मन का चालक एक है,प्यार,प्यार बस प्यार
२०
मन के भीतर बैठकर, मन की सुन नादान
मन के भीतर ही बसें,गीता और कुरान
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३ अज़ीब बातें

7:13 PM
अहं


टूटता है
आदमी
किसी बोझ से नहीं
बल्कि इस
अहसास से
कि उसे
चाहने वाला नहीं रहा कोई

झुकता
है आदमी
किसी के आगे नहीं
बल्कि
इसलिये
कि उस का बेटा
उसकी पीठ पर चढ़्कर
ऊंचा उससे कहीं अधिक
ऊंचा हो जाये

डूबता
है आदमी
किसी नदी या झील मे नहीं
अपने ही किसी
कर्म की शर्म से

ढूंढता
है आदमी
जिन्दगी के
आखिरी पहर में
अपने पैरों के निशान
वापिस बचपन में
लौटने को

मरता
है आदमी
बन्दूक की
गोली से
या किसी बीमारी से नहीं
बल्कि
टूट गई आस से
खत्म हुए विश्वास से

सुनता
है आदमी
किसी सवाल को नहीं
सवाल से
निकले सवालिया जवाब़ को

चुनता
है आदमी
जाने अनजाने मे
आस-पास बिखरी
खुशियां नहीं
दूर से घसीट कर लाये ग़म

कहता
है आदमी
भाईचारे से नहीं
अहंकार से
स्वयं को
हम
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तूफानों से प्यार-

9:00 PM

प्रश्न उठा
दुख: का
सागर
है अपार

कठिन है
जाना इसके पार


समाधान गुना
तो छोड़

कश्ती को मझधार

अपना लहरों को

कर तूफानों से प्यार
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अगर सोनिया-राहुल मनमोहन राग न अलापते तो ?

9:54 PM



राज वैद्य बतला रहे ,देश लगा क्या रोग
बड़े पदों पर गये , छोटे-छोटे लोग

जी हां
हम सभी बहुत खुश हैं ,भारतीय लोकतंत्र के चुनाव परिणामों से खैर हालात को देखते हुए खुश हुआ जा सकता है
क्यॊंकि जनता के पास इससे बेहतर विकल्प भी नहीं था। लेकिन जैसा अखबार या मीडिया कह रहा है कि यह राहुल एंड कंपनी तथा कथित युवा-ब्रिगेड की जीत है ऐसा न्ही है. यह वोटे भी अत्यधिक महत्वाकांक्षी लोगो को नकारने हेतु वोट है ,जी अडवानी ,माया ,देवगोड़ा,चंद्र्बाबू या जयललिता ,मुलायम सभी तो प्रधान मंत्री की कुर्सी के पीछे भाग रहे थे, यहां मनमोहन की साफ़ सुथरी छवि तथा सोनिया का तथा-कथित कुर्सी त्याग ही एक विकल्प मिला जनता को। अगर कांग्रेस विशेषत: सोनिया-राहुल अगर मनमोहन राग अलापते तो परिणाम कुछ और भी हो सकते थे
लेकिन अमीर-जादों की युवा ब्रिगेड शायद india का ज्ञान-ध्यान तो कर लेगी पर भारत [ देश की अधिकांश जनता का दुख दर्द क्या रहुल के दो दिन के झोपड़ीवास से जाना जा सकता है
तथास्तु
आमीन
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किशोरियों की तरह कूदते-फाँदते

7:44 PM

क्या होगा कोई मनुष्य?
क्या होगा
कोई मनुष्य ऐसा
जिसने न उठाया हो
लुत्फ
बादलों की लुकमींचणी का

क्या होगा
मनुष्य ऐसा
जिसने न देखा हो
उल्काओं को
किशोरियों की तरह कूदते-फाँदते

क्या होगा
कोई मनुष्य ऐसा

जिस के पाँव

न जले हों जेठ की धूप में


क्या होगा
कोई मनुष्य ऐसा

जो न नहाया हो
भादों की बरसात में


क्या होगा
कोई मनुष्य ऐसा
जिस की हड्डियाँ

न ठिठुरी हों पूष मास में


अगर होगा
कोई मनुष्य ऐसा

तो अवश्य ही रहता होगा
वह किसी
साठ सत्तर मन्जिले
कठघरे में

किसी महानगर
कहलाते
चिडिय़ा घर में।
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आधे दिल में किसे रक्खूं ?

10:26 PM


डॉक्टर ने
सरगोशी के लहजे में कहा
सुनो !
एक दिल में
चार वाल्व होते हैं
और
तुम्हारे दो वाल्व खराब हैं
दो वाल्व
माने आधा -दिल
अब तुम्ही कहो
इस आधे दिल में
किसे रक्खूं
तुम्हें या अपने गमों को
तुम्हें तो
स्वस्थ शरीर व जवां दिल
मिल जाय़ेंगे
मेरे गम
बेचारे कहां जायेंगे
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बारूदी सुरंगों में पागल रहते हैं-एक आजाद नज़्म

3:09 AM

2 कलिंग हर चेहरे पे था शिकस्त का धुँआ
कहते हो कैसे इसे, फतेह का कारवां

दिन करता है मीलों-मील,सफर

रात कटती है, लम्हा दर लम्हा
थकान, लाचारी, बेबसी, बेख्याली थी
लबरेज दु:ख से, हर किसी की प्याली थी

तेरे करीब जो भी आया, हलाक हुआ
तेरी आँच में,हर खुशी, हर गम, खाक हुआ

सीख के गया जो तुझसे इल्म
इल्मो
कत्लो-गारत के हुनर से बेबाक हुआ

तेरी भी ऐ कलिंग अजीब मस्ती है
झुकी तेरे रूबरू प्रियदर्शी हस्ती है

नेस्तोनाबूद होकर भी जीता रहा है तू
हर रूह का फटा दामन सीता रहा है तू
जीतकर तुझको जश्ने फतह न कर पाया अशोक

कैसे थे तेरे जख्म, तेरा लहू, तेरा सोग
सोगवार होना पड़ा उसको भी यहाँ
हर चेहरे पे था शिकस्त का धुआँ

देख कर तेरी बरबादी, रो दिया था सम्राट

छोड़ दिए उसी रोज से, सारे शाही ठाठ-बाट

रोता था और अश्क बहाता था वो
अपने किए पर बार-बार पछताता था वो
पीछे मुड़ता था, मुँह छुपाता था, वो

हर बार तबाही को सामने पाता था वो

बड़ी किल्लत थी, बड़ी बेजारी थी
उसने कलिंग जीता था, पर बाजी हारी थी

उसके जहन में, उमड़ रहे थे अश्कों के बादल

उसकी रूह में उठ रही थी, आँधियाँ पागल

छोड़ के कत्ले-आम, अहिंसा को अपनाना पड़ा
महलों को त्याग, फकीरों की राह जाना पड़ा
तब भी क्या मिल पाया था उसे, सकून
उतर गया था उस पर से, जंग का जुनून

तरफ भी जाता था, रोने की सदा आती थी
सोने न देती थी, हर पल जगा जाती थी

उसके हाथों से, शमसीर छूटी थी
जान लिया था उसने, कि तकदीर फूटी थी

हर कतराए-लहू से, गुल उगाए, उसने

अमन की जय बोली, अहिंसा के परचम, फहराए उसने

आज फिर से तुझको उठना होगा कलिंग

सरगोशी करने लगी है, फिर जंग
आज फिर सब हाथों में हैं तलवारें

जहर उगलने लगी है हर जुबां

हर रूह में है अन्धेरा सा कुआँ
हर चेहरे पर है शिकस्त का धुआं

नहीं याद उन्हें हिरोशिमा नागासाकी है

पोखरण की राख में ब्रह्मास्त्र की राख बाकी है

बुद्ध हंसता है¹ वे कहते हैं
बारूदी सुरंगों में पागल रहते हैं

जब सुरंग फटेगी तो कहकहे ढह जाएंगे

एक बार फिर जमींदोज दोजखी गढ्ढे रह जाएंगे।

शेष रह जाएगी गीदड़ों की हुआँ-हुआँ

हर चेहरे पे होगा फिर शिकस्त का धुआँ।

¹बुद्ध हँसता है-विडम्बना देखिए पोखरण १ विस्फोट का कोड वर्ड संकेत शब्दक था बुद्ध हँस रहा है।
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अपने ही घर में अजनबी-?

7:06 PM


माँ नहीं है

माँ
नहीं है
बस मां की पेंटिंग है,

पर
उसकी चश्मे से झाँकती
आँखें
देख रही हैं बेटे के दुख

बेटा
अपने ही घर में
अजनबी हो गया है।

वह
अल सुबह उठता है
पत्नी के खर्राटों के बीच
अपने दुखों
की कविताएं लिखता है
रसोई में
जाकर चाय बनाता है
तो मुन्डू आवाज सुनता है
कुनमुनाता है
फिर करवट बदल कर सो जाता है

जब तक
घर जागता है
बेटा शेव कर नहा चुका होता है

नौकर
ब्रेड और चाय का नाश्ता
टेबुल पर पटक जाता है क्योंकि
उसे जागे हुए घर को
बेड टी देनी है

बेड टी पीकर
बेटे की पत्नी नहीं?
घर की मालकिन उठती है।
हाय सुरू !
सुरेश भी नहीं
कह बाथरूम में घुस जाती है

मां सोचती है
वह तो हर सुबह उठकर
पति के पैर छूती थी
वे उन्नीदें से
उसे भींचते थे
चूमते थे फिर सो जाते थे
पर
उसके घर में, उसके बेटे के साथ
यह सब क्या हो रहा है

बेटा ब्रेड चबाता
काली चाय के लंबे घूंट भरता
तथा सफेद नीली-पीली तीन चार गोली
निगलता
अपना ब्रीफकेस उठाता है

कमरे से निकलते-निकलते
उसकी तस्वीर के पास खड़ा होता है
उसे प्रणाम करता है
और लपक कर कार में चला जाता है।

माँ की आंखें
कार में भी उसके साथ हैं
बेटे का सेल फोन मिमियाता है
माँ डर जाती है
क्योंकि रोज ही
ऐसा होता है
अब बेटे का एक हाथ स्टीयरिंग पर है
एक में सेल फोन है
एक कान सेलफोन
सुन रहा है
दूसरा ट्रेफिक की चिल्लियाँ,
एक आँख फोन
पर बोलते व्यक्ति को देख रही है
दूसरी ट्रेफिक पर लगी है
माँ डरती है
सड़क भीड़ भरी है।
कहीं कुछ अघटित न घट जाए?

पर शुक्र है
बेटा दफ्तर पहुँच जाता है
कोट उतार कर टाँगता है
टाई ढीली करता है
फाइलों के ढेर में डूब जाता है

उसकी सेक्रेटरी
बहुत सुन्दर लड़की है
वह कितनी ही बार बेटे के
केबिन में आती है
पर बेटा उसे नहीं देखता
फाइलों में डूबा हुआ बस सुनता है
कहता है, आंख ऊपर नहीं उठाता

मां की आंखें सब देख रही हैं
बेटे को क्या हो गया है?

बेटा दफ्तर की मीटिंग में जाता है,
तो उसका मुखौटा बदल जाता है
वह थकान औ ऊब उतार कर
नकली मुस्कान औढ़ लेता है;
बातें करते हुए
जान बूझ कर मुस्कराता है
फिर दफ्तर खत्म करके
घर लौट आता है।

पहले वह नियम से
क्लब जाता था
बेडमिंटन खेलता था
दारू पीता था
खिलखिलाता था
उसके घर जो पार्टियां होती थीं
उनमें जिन्दगी का शोर होता था

पार्टियां अब भी
होती हैं
पर जैसे कम्प्यूटर पर प्लान की गई हों।
चुप चाप
स्कॉच पीते मर्द, सोफ्ट ड्रिक्स लेती औरतें
बतियाते हैं मगर
जैसे नाटक में रटे रटाए संवाद बोल रहे हों
सब बेजान
सब नाटक, जिन्दगी नहीं

बेटा लौटकर टीवी खोलता है
खबर सुनता है
फिर
अकेला पैग लेकर बैठ जाता है

पत्नी
बाहर क्लब से लौटती है
हाय सुरू!
कहकर अपना मुखौटा तथा साज
सिंगार उतार कर
चोगे सा गाऊन पहन लेती है
पहले पत्नियाँ पति के लिए सजती
संवरती थी अब वे पति के सामने
लामाओं जैसी आती हैं
किस के लिए सज संवर कर
क्लब जाती हैं?
मां समझ नहीं पाती है

बेटा पैग और लेपटाप में डूबा है
खाना लग गया है
नौकर कहता है;
घर-डाइनिंग टेबुल पर आ जमा है
हाय डैडी! हाय पापा!
उसके बेटे के बेटी-बेटे मिनमिनाते हैं
और अपनी अपनी प्लेटों में डूब जाते हैं
बेटा बेमन से
कुछ निगलता है फिर
बिस्तर में आ घुसता है

कभी अखबार
कभी पत्रिका उलटता है

फिर दराज़ से
निकाल कर गोली खाता है
मुँह ढक कर सोने की कोशिश में जागता है
बेड के दूसरे कोने पर बहू-बेटे की पत्नी
के खर्राटे गूंजने लगते हैं

बेटा साइड लैंप जला कर
डायरी में
अपने दुख समेटने बैठ जाता है

मां नहीं है
उसकी पेंटिंग है
उस पेंटिंग के चश्मे के
पीछे से झांकती
मां की आंखे देख रही हैं
घर-घर नहीं
रहा है
होटल हो गया है
और उसका
अपना बेटा महज
एक अजनबी।

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जिन्दगी और मौत के बीच-कविता

9:54 PM
रेखा
जिन्दगी
और मौत के
बीच
एक धूमिल सी रेखा है
जो
जाने कब
मिट जाएगी किसने देखा है।
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झाडू पार्टी की सरकार-चुनाव हो रहे हैं-ऐसे में आम आदमी चुनाव में किस आधार पर वोट करता है-इसका मनोविशलेषण करती एक लघु-कथा

10:09 PM

चुनाव और चम्पा
इधर कुछ दिनों से उसके पति पर चुनाव का भूत सवार था, उठते-बैठते, खाते-पीते, जागते-सोते, नहाते-धोते, बस चुनाव।
चुनाव भी क्या, झाडू पार्टी का भूत सवार था। झाडू पार्टी का बहुमत आएगा, झाडू पार्टी की सरकार बनेगी,क्योंकि झाडू पार्टी के प्रधान उनकी जाति के थे।
चिड़िया पार्टी तो गई समझो, वह अक्सर गुनगुनाता फिरता था।
काना बाती कुर्र
चिड़िया उड़ गई फुर्र
उसे चिड़िया पार्टी पर काफी गुस्सा था। उनके हलके के विधायक चिड़िया पार्टी के थे और उन्हीं की शिकायत पर उसका तबादला यहां हुआ था।
पति उसे पिछले तीन दिन से एक डम्मी मतपत्र दिखलाकर बार-बार समझा रहा था कि झाडू पर मोहर कैसे लगानी है ! कागज कैसे मोड़ना है ! उसने तो जूते के खाली डिब्बे की मतपेटी बनाकर उसे दिखलाया था कि वोट कैसे डालनी है !
आज वे मतदान केन्द्र पर सबसे पहले पहुँच गए थे। फिर भी आधे घण्टे बाद ही उन्हें अन्दर बुलाया गया। चुनाव कर्मचारी उनकी उतावली पर हँस रहे थे।
फिर उसका अँगूठा लगवाकर उसकी अंगुली पर निशान लगाया गया, उसका दिल कर रहा था कि अपनी ठुड्डी पर एक तिल बनवा ले, निशान लगाने वाले से।
पिछले चुनाव में उसकी भाभी ने अपने ऊपरी होठ पर एक तिल बनवाया था। हालाँकि उसका भाई बहुत गुस्साया था, इस बात पर। जब उसकी भाभी हँसती थी तो तिल मुलक-मुलक जाता था। उसकी भाभी तो मुँह भी कम धोती थी उन दिनों, तिल मिट जाने के डर से। पर वह लाज के मारे तिल न बनवा पाई। मर्द जाति का क्या भरोसा, क्या मान जाए क्या सोच ले !
अब उसके हाथ में असली का मतपत्रा था और वह सोच रही थी। यहाँ कालका जी आए उन्हें छह महीने ही तो हुए थे। वह राजस्थान के नीमकाथाना की रहने वाली थी और पति महेन्द्रगढ़ जिले का। दोनों ही मरुस्थल के भाग थे। हरियाली के नाम पर खेजड़ी और बबूल बस।
उसका पति वन विभाग में कुछ था। क्या था ? पता नहीं। कौन सर खपाई करे ! वह वन विभाग में था, इसकी जानकारी भी उसे यहीं आकर हुई जब वे फारेस्ट कालोनी के एक कमरे के क्वार्टर में रहने लगे।
यहाँ आकर चम्पा, हाँ यही उसका नाम था न, बहुत खुश थी। यहीं उसे पता लगा कि चम्पा का फूल भी होता है और वो इतना सुन्दर और खुशबू वाला होता है। और तो और उसकी माँ, चमेली के नाम का फूल भी था, यहाँ। इतनी हरियाली, इतनी साफ-सुथरी आबो-हवा, इतना अच्छा मौसम, जिन्दगी में पहली बार मिला था, उसे। फिर सर्दियों में उसका पति उसे शिमला ले गया था। कितनी नरम-नरम रूई के फाहों जैसी बर्फ थी। देखकर पहले तो वह भौचक्क रह गई और फिर बहुत मजे ले लेकर बर्फ में खेलती रही थी। इतना खेली थी कि उसे निमोनिया हो गया था।
फिर यहाँ कोई काम-धाम भी तो नहींं था उसे। चौका-बर्तन और क्वार्टर के सामने की फुलवाड़ी में सारा दिन बीत जाता था। वहाँ सारा दिन ढोर-डंगर का काम, खेत खलिहान का काम और ऊपर से सास के न खत्म होने वाले ताने। फिर ढेर सारे ननद देवरों की भीड़ में, कभी पति से मुँह भरकर बात भी नहींं हो पाई थी, उसकी।
उसने मतपत्र मेज पर फैला दिया। हाय ! री दैया ! मरी झाडू तो सबसे ऊपर ही थी। उसने और निशान देखने शुरू किए। कश्ती, तीर कमान,। तीर कमान देखकर उसे रामलीला याद आई। उसे लगा चिड़िया उदास है, पतंग हाँ पतंग उसे हँसती नजर आई। साइकल, हवाई जहाज, हाथी सभी कितने अच्छे निशान थे और झाडू से तो सभी अच्छे थे।
‘‘अभी वह सोच ही रही थी कि निशान कहाँ लगाए ? तभी वह बाबू जिसने उसे मतपत्र दिया था बोला-बीबी जल्दी करो और लोगों को भी वोट डालने हैं।’’
उसने मोहर उठाई और मेज पर फैले मतपत्र पर झाडू को छोड़कर सब निशानों पर लगा दी और मोहर लगाते हुए वह कह रही थी कि चिड़िया जीते, साइकल जीते, कश्ती जीते पर झाडू न जीते।
झाडू को जितवाकर वह अपना संसार कैसे उजाड़ ले ? हालांकि वह मन ही मन डर रही थी कि कहीं पति को पता न लग जाए।
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