भला लगता है आंगन में बैठना-कविता

7:28 AM
आत्म विश्लेषण
भला
लगता है
आंगन में बैठना
धूप सेंकना

पर
इसके लिए वक्त कहां?

वक्त
तो बिक गया
सहूलियतों की तलाश में

और
अधिक संचय की आस में

बीत गए
बचपन
जवानी,
जीवन के अन्तिम दिनों में

हमने
वक्त की कीमत जानी

पर तब तक तो
खत्म हो चुकी थी नीलामी

हम जैसों ने
खरीदे जमीन के टुकड़े

इकटठा कियान धन
देख सके
जरा आंख उठा

विस्तृत नभ
लपकती तड़ित
घनघोर बरसते घन
रहे पीते धुएं से भरी हवा
कभी नहीं देखा
पास में बसा हरित वन

गमलों में
सजाए पत्नी ने कैक्टस
उन पर भी
डाली उचटती सी नजर

खा गया, हमें तो यारों
दावानल सा बढ़ता अपना नगर

नगर का भी क्या दोष?
इसे भी तो हमने गढ़ा

देखते रहे
औरों के हाथ
बताते रहे भविष्य
पर अपनी
हथेली को कभी नहीं पढ़ा।
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10:14 PM
रम-बाबा

आज प्रस्तुत है पेशे से डाक्टर और शौक से कवि, कहानीकार, आलोचक, विचारक श्याम सखा 'श्याम' की एक कहानी रम-बाबा। कथाकार श्याम पिछले दस सालों से हिन्दी की त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका 'मसि-कागद' का सम्पादन भी कर रहे हैं।

मैं और राजू पुराने दोस्त व सहपाठी हैं, लगभग दस साल पुरानी बात है । मैं डॉक्टरी पास कर चु्का था और राजू वकालत । दोनों ने अपने कस्बे पास के नगर में प्रैक्टिस शुरू की थी। राजू शाम को कचहरी की धूल फाँककर खाली जेब, खाली पेट मेरे कलीनिक पर आ जाता था । जहाँ मैं भी लगभग सारा दिन खाली बैठा मक्खियाँ मारता था। हम दोनों आमने-सामने बैठे, एक-दूसरे के चेहरे को चुपचाप घूरते, सोचते, कयास लगाते कि किसने, कौन सा तीर मारा? अधिकतर हम एक-दूसरे के चेहरे पर ऊब, थकान और हताशा को पढ़ते। तब तक पास की दुकान का चाय वाला छोकरा, जिसे राजू आते-जाते चाय बोल आता था, आकर मेज पर चाय रख देता। हम दोनों, अपने-अपने गिलास में चाय को ऐसे झांकते जैसे वह मुवक्किल और मैं मरीज खोज रहा होऊँ ।फिर पुरानी आदतवश लगभग इकट्ठे गा उठते, ''हम होंगे कामयाब, हम होंगे कामयाब, एक दिन'' और चाय का गिलास उठाते चियर्स कहकर गिलास टकराते और ठहाका मारकर हँस पड़ते।

गर्दिश के दिन बीत रहे थे। राजेंद्र को कभी-कभार कोई जमानती केस मिल जाता या मेरे पास कोई एक्सीडेंट का मरीज आ जाता तो हम बढ़िया होटल में जाकर जश्न मनाते। मैं हर मरीज पर व राजू हर मुवक्किल पर वे सारे नुस्खे आजमा चुके थे, जो हमने डेल कारनेगी की पुस्तक 'सफल कैसे हों'' में पढ़े थे। मगर शायद वे नुस्खे बहुत पुराने हो चुके थे और आज के जमाने में कारगर नहीं हो रहे थे या कि हम दोनों थे ही इतने घामड़ कि प्रेक्टिस हमारे बलबूते की बात नहीं थी। हम लोग मायूस होकर नौकरी करने कीसोच रहे थे।

एक दिन अनायास ही हम दोनों की मुलाकात ऐसे व्यक्ति से हो गई, जो सफलता के अनूठे नुस्खे जानता था। हर वर्ग, हर उम्र के व्यक्ति उससे सलाह लेने जाते थे। हमने शुरू-शुरू में तो उसके पास जाना अपनी तौहीन समझा
क्योंकि वह एक मैला कुचैला बूढ़ा था, जिसकी शक्ल से ही शैतानियत टपकती थी। उसकी लंबी-उलझी गंगा-जमुनी दाढ़ी के हर बाल से मक्कारी लटकती नजर आती थी। उसकी सफाचट खलवाट ऐसे चमकती थी, जैसे मरुस्थल में नखलिस्तान । उसकी, भूरी मिचमिचाती आँखे देखकर ''सौ चूहे खाकर बिल्ली हज को चली'' कहावत याद आ जाती थी। लोग उसे जाने क्यों हरफन- मौला हुनरमन्द कहते थे? जबकि वह कभी कुछ काम करता नहीं देखा गया था। वह कहाँ रहता था हमें मालूम ही नहीं था? मगर वह सप्ताह के अन्तिम दो दिनों में जाने कहाँ से शहर के बीचों-बीच बनी मस्जिद की सीढ़ियों पर बीड़ी पीता दिख जाता था। निठल्ले जुआरी-सट्टेबाज दाँव या लाटरी का नंबर पूछने की गरज से उसके आस-पास मंडराते रहते थे। वह सबसे लापरवाह अपनी बीड़ी के कश लगाता आसमान निहारता रहता था। कई बार संभ्रान्त दिखने वाले आदमी और औरतें कारों में आते उसको सलाम-नमस्ते करते उसके पास सीढ़ियों पर बैठ जाते। ऐसे वक्त जुआरी तथा सटोरिये दूर खिसक लेते थे।



मेरे पड़ोस में लाटरी स्टाल लगाने वाला गुलशन मदान उसका बड़ा भक्त था। मैंने हुनरमन्द को कई बार उसके साथ जाते देखा था। आज शनिवार था मदान शाम को उसके पास जाता था। मैंने मदान को बुलवाया और उसके बारे में पूछा तो मदान खिल उठा, कहने लगा ''ओ साहब रम-बाबा (मदान तथा कुछ लोग उसे रम-बाबा कहते थे) तो बादशाहों का बादशाह है। हर धंधे के बारे में ऐसे जानता है जैसे दाई औरत के पेट को। उसके नुस्खे लाजवाब होते हैं, तुसीं (आप) कदी ( कभी) आजमा के देखो।''
मैं खाली बैठे, मक्खी मारते-मारते तंग आ चुका था। अतः पूछ बैठा कि वह मस्जिद के अलावा कहीं और मिल सकता है ?

''ओह! तुसीं हुक्म करो! मैं तुहाडे कोल ले आवांगा (अजी ! आप हुक्म करें, मैं उसे आपके पास ले आऊँगा)। ''

मैंने कुछ सोचकर कहा ''ठीक है, आज ही ले आओ, रात नौ बजे के बाद ।''

मैं लगभग साढ़े आठ बजे क्लिनिक बन्द करके ऊपर कमरे पर आ गया। राजेन्द्र भी कमरे पर था। दस दिन से उसने किसी मुवक्किल का मुँह नहीं देखा था। अतः वह बोतल खोले बैठा था। जब मैंने उसे बतलाया कि मदान बूढ़े हुनरमंद को ला रहा है तो वह उछल पड़ा,
''चलो मुवक्किल न सही, शायद कहानी का मसाला ही हाथ लग जाए ।''

राजू कभी-कभार कविता-कहानी लिख लेता था, उस की चार-पाँच कहानियाँ छप चु्कीं थी। मुझे इस तरह का कोई शौक न था।

लगभग साढ़े नौ बजे गुलशन हुनरमंद को लेकर आ पहुँचा। काईयाँ गुलशन के चेहरे पर अजीब तरीके श्रद्धा चिपकी हुई थी। उसने उस लंबे-तगड़े बूढ़े हुनरमंद को कुर्सी पर बैठा दिया और खुद जमीन पर उसके करीब बैठ गया।
बाबा ने सिगरेट सुलगाकर लंबा कश लिया और बोलने लगा, उसकी आवाज उसके डील-डौल, हुलिये के मुकाबिल बड़ी निराली थी । ''बेटो आजकल पैसे मेहनत, ईमानदारी, शराफत से नहीं, हुनर से कमाए जा सकते हैं । डॉक्टर तेरा धंधा थोडा मुश्किल है,अगर धंधा करना है तो प्रोफेशनल हो जा । रूह यानि आत्मा घर छोड़ आया कर क्लिनिक साथ मत लाया कर । देख, जो लोग तुझे फीस देने में आना-कानी करते हैं ना, उनसे निबटने का व फीस वसूल करने का सरल नुस्खा है ।
फिर मदान ने थैले से रम की बोतल निकाली और बाबा के सामने रख दी। रम-बाबा की आँखें छत पर टिकी थीं। मदान उसके पैर दबाए जा रहा था। लगभग दस मिनट बीते होंगे। रम बाबा ने हुंकार लगाई ''बोल अलख! दे किस्मत पलट'' और उसकी नजर मेज पर रखी रम की बोतल पर गई। वह बोतल को घूरने लगा। मैं और राजू अब तक चुपचाप तमाशाई बने बैठे थे और रम बाबा तो जैसे हमारी मौजूदगी से बेफिकर था, फिर उसने बोतल का कार्क खोला, लगभग चौथाई बोतल फर्श पर उड़ेल दी। राजू उठकर कुछ कहने को हुआ। मैंने उसका हाथ पकड़ लिया। रम बाबा ने बोतल मुँह से लगाई और देखते-देखते वह लगभग पूरी बोतल ही गटक गया। वह फिर छत या आसमान की तरफ ताकने लगा था। मदान अपने उसी कांईयाँ हाव-भाव से बाबा के दुबले पतले रोयेंदार पाँव दबाए जा रहा था। हम पर एक-एक पल भारी होता जा रहा था।

लगभग पाँच मिनट बाद, रम बाबा फिर जमीन पर लौटे और बोले, ''बोल अलख ! मूरख निपट! किस्मत पलट! मदान ने हमें संकेत किया। शायद इन्सान की फितरत ही ऐसी है कि अजीब व लीक से ह्टकर अनजानी शक्तियों को पूजने लगता है। जैसे गुफा मानव सूरज, पवन, पहाड़, आग, बादल, नदी, बिजली आदि को डरकर पूजता था उसी तरह आज भी हम जब भविष्य के प्रति अनिश्चित होते हैं तो गु्फा मानव की भयभीत मानसिकता में आ जाते हैं और ज्योतिषी, पंडितों, साधुओं, तांत्रिकों तथा पीठ, मजारों की गैबी ताकत के आगे झुक पड़ते हैं । शायद यही कारण था कि राजू और मैं मदान के संकेत पर रम बाबा के सामने हाथ जोड़कर जमीन पर बैठ गए।

मदान ने पैर दबाते-दबाते, बड़े दयनीय भाव से बाबा से कहा, ''बाबा! यह साडे डॉक्टर साहब ने ते एह ने वकील साहब, इन्हांदा उद्धार करो, इन्हानूं इन्हां दे पेशे दे कामयाब नुस्खे बतलाओ और सिगरेट की एक डब्बी व माचिस रम बाबा को पकड़ा दी।
बाबा ने सिगरेट सुलगाकर लंबा कश लिया और बोलने लगा, उसकी आवाज उसके डील-डौल, हुलिये के मुकाबिल बड़ी निराली थी । ''बेटो आजकल पैसे मेहनत, ईमानदारी, शराफत से नहीं, हुनर से कमाए जा सकते हैं । डॉक्टर तेरा धंधा थोडा मुश्किल है,अगर धंधा करना है तो प्रोफेशनल हो जा । रूह यानि आत्मा घर छोड़ आया कर क्लिनिक साथ मत लाया कर । देख, जो लोग तुझे फीस देने में आना-कानी करते हैं ना, उनसे निबटने का व फीस वसूल करने का सरल नुस्खा है । मान ले, तेरे पास कमर दर्द का मरीज आया, उसे जाँच कर दवा लिख दे पर उसके एक्स-रे मत कर । क्या बचेगा एक्स-रे में बीस-तीस रुपये, दवा भी ऐसी लिख कर पूरा आराम न हो, दूसरी बार जब वह आकर कहे कि, आराम कम है तो उसे दवा बदलकर दे दे तथा उसके कान में चुपके से डाल दे कि आराम नहीं हुआ तो सी.टी. स्केन की सोचेंगे कहीं कोई बड़ी बीमारी न हो । तीसरी बार साला खुद सी.टी. स्केन पर खरचेगा । तुझे चार सौ रुपए कमीशन के मिलेंगे, जो उसने तुझे पूरी बीमारी में नहीं देने थे ।''

''वो जो तेरे सामने डॉ. रजनी है ना भूखों मरती थी । एक दिन उसे नुस्खा बतलाया था। आज देख कर, कोठी, बंगला सब है साली के पास । बतलाऊँ? नुस्खा क्या था ? सुन उसके पास जब भी कोई औरत या लड़की जाँच हेतु पेशाब टैस्ट कराने आती है ना तो वह उसे बातों में लगाकर पता कर लेती है कि उसे बच्चा चाहिए कि नहीं, अगर औरत को बच्चा नही चाहिए तो वह टैस्ट रिपोर्ट में चाहे बच्चा आए या ना आए उसे कहती है कि रिपोर्ट पॉजटिव है। माने उसे बच्चा है अब तो औरत के पाँव तले की धरती निकल जाएगी और अगर लड़्की कुंआरी हुई तो आसमान टूट पड़ेगा उस पर और वह हर हालत में अबार्शन करवाएगी । टैस्ट में डाक्टर को क्या खाक बचना था ? '' अब बेहोशी का टीका लगाया । थोड़ी-सी छेड़छाड बच्चेदानी में की और पा लिए सैकड़ों रुपए बिना अबार्शन किए । सच बताऊँ उसे अबार्शन करना आता ही नहीं, असली अबार्शन तो उसकी असिस्टैंट डॉक्टर ही करती है और तू वकील, तेरा मामला तो आसान है । बस एक बार मुवक्किल फंसा ले, कितनी ही थोड़ी फीस ले ले, दस-पाँच पेशियों के बाद मुवक्किल को मुंशी से समझवा दे कि जज रिश्वत खाकर फैसले करता है । फिर देख मुवक्किल खुद ही तेरे पास भागा आयेगा रिश्व्त की पोटली लेकर। एकदम से मत रख लेना। कहना, टाउट ढूँढता हूँ । मुवक्किल के बार-बार जोर देने पर रिश्वत के पैसे रख लेना, यह कहकर कि टाउट मिल गया है और अपने खिलाफ के वकील को भी इसी तरह तैयार करले अब वादी-प्रतिवादी दोनों में से एक को तो जीतना ही है । बस हारने वाले के पैसे ईमानदारी से वापिस कर दो और जीतने वाले के पैसे दोनों वकील आधे-आधे बाँट लेना । हारने वाले से कहना कि तेरा केस तो पक्का था शायद दूसरी पार्टी ने रिश्वत ज्यादा दे दी । अब तो बुरा जमाना आ गया भाई पर कोई बात नहीं, हाईकोर्ट है ना और उससे अपील करवाकर हाईकोर्ट के वकील से कमीशन ऐंठ । बाबा कहकर चुप हो गया, फिर कहने लगा, ''अरे ! तुम ऐसा नहीं करोगे तो जज ऐसा करेंगे । मैं खुद पेशकार था, कभी, बहुत कुछ देखा है मैंने । एक जज तो बड़ा ईमानदार किस्म का बेईमान था । वह कभी भी हारने वाले को नहीं जिताता था, चाहे कितने ही पैसे कोई क्यों न दे ? उसका तरीका बड़ा नायाब था बहस के बाद, फाइल पढ़कर देख लेता वादी या प्रतिवादी में से कौन जीतेगा ? बस जीतने वाले के पीछे, मुझे लगा देता और जब तक वह प्रसाद न चढ़ा देता । तारीख लगती रहती । प्रसाद चढ़ाने पर ही फैसला लिखा जाता । न मिलने पर जज के तबादले पर अगला जज ही फैसला लिखता। दुबारा बहस सुनकर ।'' रम बाबा कुछ सौम्य हो चले थे । शायद उन्हे भी इस बात का एहसास हो गया था । उन्होने रम की बची-खुची बोतल गले में उड़ेली छत की तरफ ताका और ''अलख-किस्मत-पलट''कहकर उठकर चल दिए।

मैं और राजू भी राजू की लाई विहस्की पीकर सो गए । रात अचानक मुझे लगा कमरे में भूचाल आ गया है। उठा तो मालूम हुआ कि भूचाल नहीं आया था । राजू मुझे जोर-जोर से हिलाकर उठा रहा था ।
''ओ सिविल सर्जन उठ ! एमरजेंसी आई है, खड़ा हो यार, क्या गधे बेचकर सोता है, तू ? डॉक्टर की नींद तो कुत्ते जैसी होनी चाहिए ।''

मैं जल्दी से उठकर नीचे गया, देखा पड़ोसी रामकिशन हलवाई अपनी बीमार माँ को रिक्शा पर लेकर आया था ।वह कहने लगा, ''डॉक्टर साहिब, मेरी माँ दमे की पुरानी मरीज है । अबसे पहले हम डॉक्टर सन्तलाल के पास जाते थे, वे ‚ग्लूकोज में चार-पाँच टीके लगाते हैं, आक्सीजन देते हैं तब कहीं जाकर दो दिन में ठीक होती है । अबकी बार हमने सोचा, पड़ोसी डॉक्टर को दिखा लेते हैं । आप जल्दी ‚ग्लूकोज लगाएं बहुत तकलीफ में है ।''

मैंने अन्दर जाकर उसकी माँ की जाँच की तो पाया कि वह सचमुच दमे की मरीज है । एक बार तो रम बाबा की बात याद कर सोचा‚ ग्लूकोज तथा आक्सीजन लगा ही दूँ। मन दुविधा में था कि रम बाबा की बात मानूँ या न मानूँ । पर फिर मेरी आत्मा ने मुझे धिक्कारा और मैंने रमबाबा की बात न मानकर उससे भी ऊपर वाले 'बाबा' (भगवान) की बात मानकर, बुढिया को नेबुलाइजर से दवा दी, कुछ मिंटों में ही उसे आराम आ गया । उसे कुछ दवा व इन्हेलर लिखकर दिया और लेने का तरीका समझा दिया । बूढ़िया व रामकिशन हैरान थे ।

बूढ़िया के इतने जल्दी बिना ‚ग्लूकोज व टीके के आराम हो जाने से एक बार पूछा ''डॉक्टर साहिब दोबारा तो अटैक नहीं हो जाएगा ।''

मैंने कहा, 'नहीं'अब अगर तुम इन्हेलर लेती रही तो ऐसा अटैक नहीं पड़ेगा। बूढ़िया आशीष देती हुई चली गई। पता नहीं बूढिया की आशीष का असर था या रामकिसन द्वारा किये गये, अपनी माँ के ठीक होने के प्रचार का, रम-बाबा के नुस्खों के बिना ही मेरी प्रेक्टिस चल निकली थी ।
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कहानी-रम-बाबा

9:50 PM

रम-बाबा

आज प्रस्तुत है पेशे से डाक्टर और शौक से कवि, कहानीकार, आलोचक, विचारक श्याम सखा 'श्याम' की एक कहानी रम-बाबा। कथाकार श्याम पिछले दस सालों से हिन्दी की त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका 'मसि-कागद' का सम्पादन भी कर रहे हैं।

मैं और राजू पुराने दोस्त व सहपाठी हैं, लगभग दस साल पुरानी बात है । मैं डॉक्टरी पास कर चु्का था और राजू वकालत । दोनों ने अपने कस्बे पास के नगर में प्रैक्टिस शुरू की थी। राजू शाम को कचहरी की धूल फाँककर खाली जेब, खाली पेट मेरे कलीनिक पर आ जाता था । जहाँ मैं भी लगभग सारा दिन खाली बैठा मक्खियाँ मारता था। हम दोनों आमने-सामने बैठे, एक-दूसरे के चेहरे को चुपचाप घूरते, सोचते, कयास लगाते कि किसने, कौन सा तीर मारा? अधिकतर हम एक-दूसरे के चेहरे पर ऊब, थकान और हताशा को पढ़ते। तब तक पास की दुकान का चाय वाला छोकरा, जिसे राजू आते-जाते चाय बोल आता था, आकर मेज पर चाय रख देता। हम दोनों, अपने-अपने गिलास में चाय को ऐसे झांकते जैसे वह मुवक्किल और मैं मरीज खोज रहा होऊँ ।फिर पुरानी आदतवश लगभग इकट्ठे गा उठते, ''हम होंगे कामयाब, हम होंगे कामयाब, एक दिन'' और चाय का गिलास उठाते चियर्स कहकर गिलास टकराते और ठहाका मारकर हँस पड़ते।

गर्दिश में दिन बीत रहे थे। राजेंद्र को कभी-कभार कोई जमानती केस मिल जाता या मेरे पास कोई एक्सीडेंट का मरीज आ जाता तो हम बढ़िया होटल में जाकर जश्न मनाते। मैं हर मरीज पर व राजू हर मुवक्किल पर वे सारे नुस्खे आजमा चुके थे, जो हमने डेल कारनेगी की पुस्तक 'सफल कैसे हों'' में पढ़े थे। मगर शायद वे नुस्खे बहुत पुराने हो चुके थे और आज के जमाने में कारगर नहीं हो रहे थे या कि हम दोनों थे ही इतने घामड़ कि प्रेक्टिस हमारे बलबूते की बात नहीं थी। हम लोग मायूस होकर नौकरी करने की सोच रहे थे।

एक दिन अनायास ही हम दोनों की मुलाकात ऐसे व्यक्ति से हो गई, जो सफलता के अनूठे नुस्खे जानता था। हर वर्ग, हर उम्र के व्यक्ति उससे सलाह लेने जाते थे। हमने शुरू-शुरू में तो उसके पास जाना अपनी तौहीन समझा क्योंकि वह एक मैला कुचैला बूढ़ा था, जिसकी शक्ल से ही शैतानियत टपकती थी। उसकी लंबी-उलझी गंगा-जमुनी दाढ़ी के हर बाल से मक्कारी लटकती नजर आती थी। उसकी सफाचट खलवाट ऐसे चमकती थी, जैसे मरुस्थल में नखलिस्तान । उसकी, भूरी मिचमिचाती आँखे देखकर ''सौ चूहे खाकर बिल्ली हज को चली'' कहावत याद आ जाती थी। लोग उसे जाने क्यों हरफन- मौला हुनरमन्द कहते थे? जबकि वह कभी कुछ काम करता नहीं देखा गया था। वह कहाँ रहता था हमें मालूम ही नहीं था? मगर वह सप्ताह के अन्तिम दो दिनों में जाने कहाँ से शहर के बीचों-बीच बनी मस्जिद की सीढ़ियों पर बीड़ी पीता दिख जाता था। निठल्ले जुआरी-सट्टेबाज दाँव या लाटरी का नंबर पूछने की गरज से उसके आस-पास मंडराते रहते थे। वह सबसे लापरवाह अपनी बीड़ी के कश लगाता आसमान निहारता रहता था। कई बार संभ्रान्त दिखने वाले आदमी और औरतें कारों में आते उसको सलाम-नमस्ते करते उसके पास सीढ़ियों पर बैठ जाते। ऐसे वक्त जुआरी तथा सटोरिये दूर खिसक लेते थे।


मेरे पड़ोस में लाटरी स्टाल लगाने वाला गुलशन मदान उसका बड़ा भक्त था। मैंने हुनरमन्द को कई बार उसके साथ जाते देखा था। आज शनिवार था मदान शाम को उसके पास जाता था। मैंने मदान को बुलवाया और उसके बारे में पूछा तो मदान खिल उठा, कहने लगा ''ओ साहब रम-बाबा (मदान तथा कुछ लोग उसे रम-बाबा कहते थे) तो बादशाहों का बादशाह है। हर धंधे के बारे में ऐसे जानता है जैसे दाई औरत के पेट को। उसके नुस्खे लाजवाब होते हैं, तुसीं (आप) कदी ( कभी) आजमा के देखो।''
मैं खाली बैठे, मक्खी मारते-मारते तंग आ चुका था। अतः पूछ बैठा कि वह मस्जिद के अलावा कहीं और मिल सकता है ?

''ओह! तुसीं हुक्म करो! मैं तुहाडे कोल ले आवांगा (अजी ! आप हुक्म करें, मैं उसे आपके पास ले आऊँगा)। ''

मैंने कुछ सोचकर कहा ''ठीक है, आज ही ले आओ, रात नौ बजे के बाद ।''

मैं लगभग साढ़े आठ बजे क्लिनिक बन्द करके ऊपर कमरे पर आ गया। राजेन्द्र भी कमरे पर था। दस दिन से उसने किसी मुवक्किल का मुँह नहीं देखा था। अतः वह बोतल खोले बैठा था। जब मैंने उसे बतलाया कि मदान बूढ़े हुनरमंद को ला रहा है तो वह उछल पड़ा,
''चलो मुवक्किल न सही, शायद कहानी का मसाला ही हाथ लग जाए ।''राजू कभी-कभार कविता-कहानी लिख लेता था, उस की चार-पाँच कहानियाँ छप चु्कीं थी। मुझे इस तरह का कोई शौक न था।लगभग साढ़े नौ बजे गुलशन हुनरमंद को लेकर आ पहुँचा। काईयाँ गुलशन के चेहरे पर अजीब तरीके श्रद्धा चिपकी हुई थी। उसने उस लंबे-तगड़े बूढ़े हुनरमंद को कुर्सी पर बैठा दिया और खुद जमीन पर उसके करीब बैठ गया।
बाबा ने सिगरेट सुलगाकर लंबा कश लिया और बोलने लगा, उसकी आवाज उसके डील-डौल, हुलिये के मुकाबिल बड़ी निराली थी । ''बेटो आजकल पैसे मेहनत, ईमानदारी, शराफत से नहीं, हुनर से कमाए जा सकते हैं । डॉक्टर तेरा धंधा थोडा मुश्किल है,अगर धंधा करना है तो प्रोफेशनल हो जा । रूह यानि आत्मा घर छोड़ आया कर क्लिनिक साथ मत लाया कर । देख, जो लोग तुझे फीस देने में आना-कानी करते हैं ना, उनसे निबटने का व फीस वसूल करने का सरल नुस्खा है ।
फिर मदान ने थैले से रम की बोतल निकाली और बाबा के सामने रख दी। रम-बाबा की आँखें छत पर टिकी थीं। मदान उसके पैर दबाए जा रहा था। लगभग दस मिनट बीते होंगे। रम बाबा ने हुंकार लगाई ''बोल अलख! दे किस्मत पलट'' और उसकी नजर मेज पर रखी रम की बोतल पर गई। वह बोतल को घूरने लगा। मैं और राजू अब तक चुपचाप तमाशाई बने बैठे थे और रम बाबा तो जैसे हमारी मौजूदगी से बेफिकर था, फिर उसने बोतल का कार्क खोला, लगभग चौथाई बोतल फर्श पर उड़ेल दी। राजू उठकर कुछ कहने को हुआ। मैंने उसका हाथ पकड़ लिया। रम बाबा ने बोतल मुँह से लगाई और देखते-देखते वह लगभग पूरी बोतल ही गटक गया। वह फिर छत या आसमान की तरफ ताकने लगा था। मदान अपने उसी कांईयाँ हाव-भाव से बाबा के दुबले पतले रोयेंदार पाँव दबाए जा रहा था। हम पर एक-एक पल भारी होता जा रहा था।

लगभग पाँच मिनट बाद, रम बाबा फिर जमीन पर लौटे और बोले, ''बोल अलख ! मूरख निपट! किस्मत पलट! मदान ने हमें संकेत किया। शायद इन्सान की फितरत ही ऐसी है कि अजीब व लीक से ह्टकर अनजानी शक्तियों को पूजने लगता है। जैसे गुफा मानव सूरज, पवन, पहाड़, आग, बादल, नदी, बिजली आदि को डरकर पूजता था उसी तरह आज भी हम जब भविष्य के प्रति अनिश्चित होते हैं तो गु्फा मानव की भयभीत मानसिकता में आ जाते हैं और ज्योतिषी, पंडितों, साधुओं, तांत्रिकों तथा पीठ, मजारों की गैबी ताकत के आगे झुक पड़ते हैं । शायद यही कारण था कि राजू और मैं मदान के संकेत पर रम बाबा के सामने हाथ जोड़कर जमीन पर बैठ गए।

मदान ने पैर दबाते-दबाते, बड़े दयनीय भाव से बाबा से कहा, ''बाबा! यह साडे डॉक्टर साहब ने ते एह ने वकील साहब, इन्हांदा उद्धार करो, इन्हानूं इन्हां दे पेशे दे कामयाब नुस्खे बतलाओ और सिगरेट की एक डब्बी व माचिस रम बाबा को पकड़ा दी।
बाबा ने सिगरेट सुलगाकर लंबा कश लिया और बोलने लगा, उसकी आवाज उसके डील-डौल, हुलिये के मुकाबिल बड़ी निराली थी । ''बेटो आजकल पैसे मेहनत, ईमानदारी, शराफत से नहीं, हुनर से कमाए जा सकते हैं । डॉक्टर तेरा धंधा थोडा मुश्किल है,अगर धंधा करना है तो प्रोफेशनल हो जा । रूह यानि आत्मा घर छोड़ आया कर क्लिनिक साथ मत लाया कर । देख, जो लोग तुझे फीस देने में आना-कानी करते हैं ना, उनसे निबटने का व फीस वसूल करने का सरल नुस्खा है । मान ले, तेरे पास कमर दर्द का मरीज आया, उसे जाँच कर दवा लिख दे पर उसके एक्स-रे मत कर । क्या बचेगा एक्स-रे में बीस-तीस रुपये, दवा भी ऐसी लिख कर पूरा आराम न हो, दूसरी बार जब वह आकर कहे कि, आराम कम है तो उसे दवा बदलकर दे दे तथा उसके कान में चुपके से डाल दे कि आराम नहीं हुआ तो सी.टी. स्केन की सोचेंगे कहीं कोई बड़ी बीमारी न हो । तीसरी बार साला खुद सी.टी. स्केन पर खरचेगा । तुझे चार सौ रुपए कमीशन के मिलेंगे, जो उसने तुझे पूरी बीमारी में नहीं देने थे ।''

''वो जो तेरे सामने डॉ. रजनी है ना भूखों मरती थी । एक दिन उसे नुस्खा बतलाया था। आज देख कर, कोठी, बंगला सब है साली के पास । बतलाऊँ? नुस्खा क्या था ? सुन उसके पास जब भी कोई औरत या लड़की जाँच हेतु पेशाब टैस्ट कराने आती है ना तो वह उसे बातों में लगाकर पता कर लेती है कि उसे बच्चा चाहिए कि नहीं, अगर औरत को बच्चा नही चाहिए तो वह टैस्ट रिपोर्ट में चाहे बच्चा आए या ना आए उसे कहती है कि रिपोर्ट पॉजटिव है। माने उसे बच्चा है अब तो औरत के पाँव तले की धरती निकल जाएगी और अगर लड़्की कुंआरी हुई तो आसमान टूट पड़ेगा उस पर और वह हर हालत में अबार्शन करवाएगी । टैस्ट में डाक्टर को क्या खाक बचना था ? '' अब बेहोशी का टीका लगाया । थोड़ी-सी छेड़छाड बच्चेदानी में की और पा लिए सैकड़ों रुपए बिना अबार्शन किए । सच बताऊँ उसे अबार्शन करना आता ही नहीं, असली अबार्शन तो उसकी असिस्टैंट डॉक्टर ही करती है और तू वकील, तेरा मामला तो आसान है । बस एक बार मुवक्किल फंसा ले, कितनी ही थोड़ी फीस ले ले, दस-पाँच पेशियों के बाद मुवक्किल को मुंशी से समझवा दे कि जज रिश्वत खाकर फैसले करता है । फिर देख मुवक्किल खुद ही तेरे पास भागा आयेगा रिश्व्त की पोटली लेकर। एकदम से मत रख लेना। कहना, टाउट ढूँढता हूँ । मुवक्किल के बार-बार जोर देने पर रिश्वत के पैसे रख लेना, यह कहकर कि टाउट मिल गया है और अपने खिलाफ के वकील को भी इसी तरह तैयार करले अब वादी-प्रतिवादी दोनों में से एक को तो जीतना ही है । बस हारने वाले के पैसे ईमानदारी से वापिस कर दो और जीतने वाले के पैसे दोनों वकील आधे-आधे बाँट लेना । हारने वाले से कहना कि तेरा केस तो पक्का था शायद दूसरी पार्टी ने रिश्वत ज्यादा दे दी । अब तो बुरा जमाना आ गया भाई पर कोई बात नहीं, हाईकोर्ट है ना और उससे अपील करवाकर हाईकोर्ट के वकील से कमीशन ऐंठ । बाबा कहकर चुप हो गया, फिर कहने लगा, ''अरे ! तुम ऐसा नहीं करोगे तो जज ऐसा करेंगे । मैं खुद पेशकार था, कभी, बहुत कुछ देखा है मैंने । एक जज तो बड़ा ईमानदार किस्म का बेईमान था । वह कभी भी हारने वाले को नहीं जिताता था, चाहे कितने ही पैसे कोई क्यों न दे ? उसका तरीका बड़ा नायाब था बहस के बाद, फाइल पढ़कर देख लेता वादी या प्रतिवादी में से कौन जीतेगा ? बस जीतने वाले के पीछे, मुझे लगा देता और जब तक वह प्रसाद न चढ़ा देता । तारीख लगती रहती । प्रसाद चढ़ाने पर ही फैसला लिखा जाता । न मिलने पर जज के तबादले पर अगला जज ही फैसला लिखता। दुबारा बहस सुनकर ।'' रम बाबा कुछ सौम्य हो चले थे । शायद उन्हे भी इस बात का एहसास हो गया था । उन्होने रम की बची-खुची बोतल गले में उड़ेली छत की तरफ ताका और ''अलख-किस्मत-पलट''कहकर उठकर चल दिए।

मैं और राजू भी राजू की लाई विहस्की पीकर सो गए । रात अचानक मुझे लगा कमरे में भूचाल आ गया है। उठा तो मालूम हुआ कि भूचाल नहीं आया था । राजू मुझे जोर-जोर से हिलाकर उठा रहा था ।
''ओ सिविल सर्जन उठ ! एमरजेंसी आई है, खड़ा हो यार, क्या गधे बेचकर सोता है, तू ? डॉक्टर की नींद तो कुत्ते जैसी होनी चाहिए ।''

मैं जल्दी से उठकर नीचे गया, देखा पड़ोसी रामकिशन हलवाई अपनी बीमार माँ को रिक्शा पर लेकर आया था ।वह कहने लगा, ''डॉक्टर साहिब, मेरी माँ दमे की पुरानी मरीज है । अबसे पहले हम डॉक्टर सन्तलाल के पास जाते थे, वे ‚ग्लूकोज में चार-पाँच टीके लगाते हैं, आक्सीजन देते हैं तब कहीं जाकर दो दिन में ठीक होती है । अबकी बार हमने सोचा, पड़ोसी डॉक्टर को दिखा लेते हैं । आप जल्दी ‚ग्लूकोज लगाएं बहुत तकलीफ में है ।''

मैंने अन्दर जाकर उसकी माँ की जाँच की तो पाया कि वह सचमुच दमे की मरीज है । एक बार तो रम बाबा की बात याद कर सोचा‚ ग्लूकोज तथा आक्सीजन लगा ही दूँ। मन दुविधा में था कि रम बाबा की बात मानूँ या न मानूँ । पर फिर मेरी आत्मा ने मुझे धिक्कारा और मैंने रमबाबा की बात न मानकर उससे भी ऊपर वाले 'बाबा' (भगवान) की बात मानकर, बुढिया को नेबुलाइजर से दवा दी, कुछ मिंटों में ही उसे आराम आ गया । उसे कुछ दवा व इन्हेलर लिखकर दिया और लेने का तरीका समझा दिया । बूढ़िया व रामकिशन हैरान थे ।

बुढ़िया के इतने जल्दी बिना ‚ग्लूकोज व टीके के आराम हो जाने से एक बार पूछा ''डॉक्टर साहिब दोबारा तो अटैक नहीं हो जाएगा ।''

मैंने कहा, 'नहीं'अब अगर तुम इन्हेलर लेती रही तो ऐसा अटैक नहीं पड़ेगा। बूढ़िया आशीष देती हुई चली गई। पता नहीं बूढिया की आशीष का असर था या रामकिसन द्वारा किये गये, अपनी माँ के ठीक होने के प्रचार का, रम-बाबा के नुस्खों के बिना ही मेरी प्रेक्टिस चल निकली थी ।
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चढ़े न दूजो रंग

2:41 AM
मेरा
मन करता है
मैं
तुम्हारी
एक तस्वीर बनाऊं
काली-
बहुत काली
काजल सी काली
सियाही से
कितनी
अद्भुत लगोगी तुम
तब
तुम्हारे चेहरे से
बदलते रंग
मेरे सिवा, कौन बूझ पाएगा
आर्ट गैलरी
के
तन्हा कोने में लगी
इस तस्वीर को
कोई नहीं देखेगा
केवल
मैं पढूंगा
तुम्हारे होठों पर
लपक आई-दुष्ट मुस्कान को
केवल मैं
सुनूंगा रातों में गूंजते
मूक राग को- अनूठी तान को
और बज उठेंगे
उसके साथ
मेरी
मन वीणा के तार
मैं रखूंगा
इस तस्वीर को सहेज संवार
बरसात में
और तस्वीरों के रंग जब
धुल जाएंगे
सूर की काली कमर सी
तुम्हारी तस्वीर से तब फूटेगा
इन्द्रघनुष सा
सतरंगी दरिया
पर मैं-क्या करूं?
वह पवित्र काला रंग
कहां से लाऊं
जो
तुमने
आंसुओं में काजल
घोलकर
बनाया था, मेरी खातिर
और मैं खड़ा रहा
काजल से सूनी आंखों का
अबोध
सौन्दर्य देखता
काजली रंग
जाने कहां बह गया
मैं
बस खड़ा रह गया।
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जो भी दिल्ली आता है, हो जाता चांडाल है

1:28 AM


जो भी दिल्ली आता है, हो जाता चांडाल है

पहले भी यही हाल था
अब भी तो वही हाल है
दिल्ली में हर गीदड़
पहने शेर की खाल है

उत्तर में कश्मीर है
फूटी उसकी तक़दीर है
कहने को कुर्सी की लड़ाई है
पर आफ़त तो जनता की आई है
वहां जो बैठा अब्दुल्ला है
वो सत्ता का दुमछल्ला है
जब चिनार जलते हैं, 'डल' रोती है
उसके हाथों लंदन में विह्सकी होती है
सीधा मत समझो उसको
पूरा गुरुघंटाल है।
पहले भी यही हाल था॰॰॰॰

उसके आगे हिमाचल है
मैला उसका भी आँचल है।
जनता की कीमत वहाँ भी छद्‌दाम है
दुखी सारे लिग हैं, सुखी सुखराम है
तिहाड़ जाकर भी वो मालपुए खायेगा
तेरे नसीब में तो प्यारे, रोटी और दाल है।
पहले भी वही हाल था॰॰॰॰

उससे आगे पंजाब है
उतरी उसकी भी आब है
नेता सारे हँसते है
लहू के आँसू रोती चिनाब है
लहू सना वहाँ भी सारा गुलाल है
पहले भी यही हाल था॰॰॰॰

दूध दही जो खाणा है
देसां में देस हरयाणा है
चादर उसकी भी मैली है
हर तरफ़ दारू की थैली है
रक्तहीन जनता पीली-पीली है
नेता सारे लाल-लाल-लाल हैं
[देवीलाल-बंसीलाल-भजनलाल है]
पहले भी यही हाल था॰॰॰॰

आगे अपनी दिल्ली है
ढीली उसकी तो किल्ली है
चहुँओर पोंछा जाता बहनों का सिन्दूर है
दिल्ली में जलता रहता नेताओं का तन्दूर है [नयनासाहनी कांड]
क्या जमुना का पानी खारा है
या टेढ़ी ग्रहों की चाल है
जो भी दिल्ली आता है [नेता]
हो जाता चांडाल है
पहले भी यही हाल था॰॰॰॰

आगे अपनी यू.पी है
छाई वहां भी चुप्पी है
कल्याण मायूस है
मुलायम उदास है
दोनों के मुंह पर ताला है
दोनों जपते माला हैं
माया महा ठगिनी है,
माया जी का जंजाल है
पहले भी यही हाल था॰॰॰॰

आगे बिहारी बाबू है
साँड़ वो बेकाबू है
नाम उसका लालू है
पूरा का पूरा चालू है
अपनी पत्नी को शासन सौपा था
छुरा पीठ में जनता की घौंपा था
शरद रामविलास नितीश का जाल है
क्या जे.पी और राजेन्दर बाबू के घर
नेताओं का पड़ा अकाल है
पहले भी यही हाल था॰॰॰॰

ये जो वाम नेता हैं
ये भी दाम लेता है
इनकी अक्ल काबंद हुआ स्कूल है
इनको समझाना फ़िजूल है
नीति-वीति भाड़ में जाए
बस्स वोट का सवाल है।
पहले भी यही हाल था॰॰॰॰

पाक में रहता इक भाई है [दाऊद]
वो मुम्बई का कसाई है
आपके हाथों दर्पण है
दक्षिण के नेता भी बने वीरप्प्न हैं

मत्त कहो सरकार है
बृहन्ला की अवतार है
सोलह टांगों पर चलती है [१६ पार्टियों का समर्थन]
लेकिन टेढ़ी चाल है
पहले भी यही हाल था॰॰॰॰

रोको लिब्रेशन की आंधी को
याद करो फिर गांधी को
जब-जब गोरे आये हैं
देश हुआ कंगाल है
पहले भी यही हाल था॰॰॰॰

यूँ मन उदास है
फिर भी मुझको आस है
अच्छे दिन लौटेंगे
पूरा ही विश्वास है

नव-पीढ़ी के खून में आ रहा उबाल है
अब बदलने वाला यह हाल है।

मित्रो यह कविता देव्गौड़ा के बाद गुजराल के प्रधान मंत्री बनने के समय लिखी थी ।

तब इसके बोल थे

जैसा देवगोड़ा था वैसा ही गुजराल है

दिल्ली में हर गीदड़ पहने शेर की खाल है

अगर आज भी हमने इन छोटी क्षेत्रीय पार्टियों को नकार कर दो तथाकथित ही सही-पर राष्ट्रीय [राष्ट्रव्यापी] तो हैं ही को नहीं चुना तो गुजराल,जिसके साथ एक भी सांसद न था जैसा ही कोई by default प्रधान मंत्री बन जाएगा या देव्गौड़ा जैसा १२-१७ सांसदो वाला बनेगा-

अच्छे बुरे जैसे हों केवल कांग्रेस-भाजपा के प्रत्याशियों को वोट दें।


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किशोरियों की तरह कूदते-फाँदते

7:46 PM

क्या होगा कोई मनुष्य?

क्या होगा
कोई मनुष्य ऐसा
जिसने
न उठाया हो लुत्फ
बादलों की लुकमींचणी का

क्या होगा
कोई मनुष्य ऐसा
जिसने
न देखा हो उल्काओं को
किशोरियों की तरह कूदते-फाँदते

क्या होगा
कोई मनुष्य ऐसा
जिस के पाँव
न जले हों जेठ की धूप में

क्या होगा
कोई मनुष्य ऐसा
जो न नहाया हो
भादों की बरसात में

क्या होगा
कोई मनुष्य ऐसा
जिस की हड्डियाँ
न ठिठुरी हों पूष मास में

अगर होगा
कोई मनुष्य ऐसा
तो अवश्य ही
रहता होगा
वह किसी
साठ सत्तर मन्जिले कठघरे में
किसी महानगर
कहलाते चिडिय़ा घर में।

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दो गज़ल हर सप्ताह

8:53 AM
मेरी दो गज़ल हर सप्ताह
http://gazalkbahane.blogspot.com/
एवम्‌
दो मुक्त छंद कविता हर सप्ताह
http://katha-kavita.blogspot.com/
पर देख सकते हैं
श्याम सखा‘श्याम
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हक ओ हकूक की लड़ाई

7:13 AM
मैं
जब भी
हक ओ हकूक
की बात करता हूं
मैं
जब भी
इन्सां के वजूद की
बात करता हूं
तो
लोग
लाठियां लेकर
मारने दौड़े चले आते हैं
चिल्लाते हैं
कि
इस पर
मसीहा उतर आया है
फिर
किसी इन्सान पर
बुद्ध, ईसा या माक्र्स
बनने का
भूत समाया है
मानो
ये सब
लक्कड़बग्घे थे
जो
बच्चों को
उठा ले जाते थे
पहले जब ऐसी बातों
पर
सर फुटौवल होता था
तो दोस्त
समझाते थे
कि
पगले
ऐसी बातें मत किया
और को जीने दे
और खुद भी जिया कर
पर मैं
उनकी बातें पचा नहीं पाता था
अब जब भी
हको हकूक
या इन्सा के वजूद की
बात पर
पिट-पिटा कर
घर लौटता हूं
तो
पत्नी आंचल से
मेरा
लहू पौंछती है
घी
हल्दी से
शरीर की चोट सेकती है
कातर
निरीह
आंखों से मेरे दिल में
झांकती है,
उसकी इन
नजरों से
मैं कमजोर पड़ जाता हूं
मेरी
रूह आंन्धी में
दीए की मानिन्द कांपती है
मैं सोचता हूं
कि अब तक
जो ख्वाब बुने थे
इन्सानियत के
सारे के सारे तोड़ दूं
पर
तभी सामने आ खड़ी होती है
बसु
माने
छोटी सी
प्यारी सी
बेटी
मेरी बेटी बसुदा
साफ
पाक आंखों से झांकती
मानो मेरी
कमजोरी को भांपती
जैसे
पूछती हो
पापा फिर कौन लड़ेगा?
उन लोगों ने
जिन्होंने खरीद लिया है
दाखिले
इंजिनयरिंग
और मेडिकल कालेजों के
जिन्होंने
मिलकर बांट ली है
सारी
नौकरियां
जाति धर्म
और भाई भतीजावाद
का नारा लगाकर
विश्वमुद्राकोष और पूंजीवादियों के हाथों
छीन रहे हैं
दस्तकारों के जीने का हक
मैं लड़खड़ाता सा
पत्नी के
कान्धे का सहारा लेकर
खड़ा होता हूं
और
अपनी कमजोरी की लाश
पर
खड़ा होकर चिल्लाता हूं
इंकलाब
जिन्दाबाद।
और
एक बार फिर
तैयार हो जाता हूं
ह्को-हकूक की
लड़ाई लड़ने के लिये
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मैं हूँ उसकी हीर

9:26 AM
1
मन् लोभी मन लालची,मन चंचल मन चोर
मन के हाथ सभी बिके,मन पर किस का जोर

तेरे मन ने जब कही,मेरे मन् की बात
हरे-हरे सब हो गये,साजन पीले पात


जिसका मन अधीर हुआ,सुनकर मेरी पीर
वो है मेरा राँझना, मैं हूँ उसकी हीर


तेरे मन पहुंची नहीं,मेरे मन की बात
नाहक हमने थे लिये,साजन फ़ेरे सात्


वो बैरी पूछै नहीं ,अब तो मेरी जात
जिसके कारण थे हुए,सारे ही उत्पात


सुनले साजन आज तू,एक पते की बात
प्यार कभी देखे नहीं.दीन-धरम या जात


मन की मन ने जब सुनी. सुन साजन झनकार
छनक् उठी पायल तभी,खनके कंगन हजार

मन फकीर है दोस्तो,मन ही साहूकार
मुझ में रह उनका हुआ,मन् ऐसा फनकार


मन की मन से जब हुई,साजन थी तकरार
जीत सका तू भी नहीं,गई तभी मैं हार
१०
मन की करनी देखकर.बौरा गया दिमाग
संबंधों में लगी तभी,बैरन कैसी आग ?
११
मनवा जब समझा नहीं,प्रीत प्रेम का राग
संबंधों घोड़े चढ़ा था,तभी बैरी दिमाग
१२
मन की हारे हार है,सभी रहे समझाय
समझा,समझा सब थके,मनवा समझे नाय

१३
मन की लागी आग तो ,वो ही सके बुझाय
जिसके मन् में,दोस्तो , प्रीत अगन लग जाय
१४
प्रीतम के द्वारे खड़ा,मनवा हुआ अधीर
इतनी देर लगा रहे,क्या सौतन है सीर
१५
मन औरत ,मन मरद भी,मन बालक नादान
नाहक मन के व्याकरण,ढूंढ़े सकल जहान
१६
मन तुलसी मीरा भया,मनवा हुआ कबीर
द्रोपदी के श्याम-सखा,पूरो म्हारो चीर
१७
अंगरलियां जब मन करे,महक उठे तब गात
सहवास तो है दोस्तो,बस तन की सौगात
१८
मन की मन से जब हुई,थी यारो तकरार
टूट गये रिश्ते सभी,सब् बैठे लाचार
१९
मन की राह अनेक हैं, मन के नगर हजार
मन का चालक एक है,प्यार,प्यार बस प्यार
२०
मन के भीतर बैठकर, मन की सुन नादान
मन के भीतर ही बसें,गीता और कुरान
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क्या फर्क पड़ता है मेरे मरने से ?

6:54 AM
क्या
फर्क पड़ता है
मेरे
जीने या मरने से ?
क्योंकि
मैं ना तो
जीते जी धरती पर बोझ हूँ
ना ही
मेरे मरने से दुनिया
खाली होने वाली है
क्या फर्क पड़ता है
मेरे जीने या मरने से
हाँ कुछ अन्तर
अवश्य आएगा
उस जगह, घर या
आसपास में
जहां मैंने इस
नाकुछ जीवन
के पचास साल
गुजार दिए हैं

मेरे बिस्तर का
वह हिस्सा खाली हो जाएगा
जहाँ मैं सोता हूँ
और मेरी पत्नी
कहलाने वाली औरत
को अकेले सोना पड़ेगा
क्येांकि वह
एक घरेलू भारतीय
महिला है
तथा जवान होते
बच्चों की माँ है,
कोई और
विकल्प भी तो नहीं हैं
उसके पास।

मेरे बेटे के
पास आ जाएगा अधिकार
मेरी जमा पूँजी को
अपने हिसाब से खर्च करने
का
इसलिए उसके आँसू
उसका ग
पत्नी के गम की तुलना में
क्षणिक होगा

मेरे दफ्तर की कुर्सी भी
एक दिन
के लिए
खाली हो जाएगी
फिर काबिज
हो जाएगा उस पर
बाबू राम भरोसे
बहुत दिन
से प्रतीक्षा में है
बेचारा
मेरी पुरानी साइकिल
को ले जाएगा कबाड़ी
क्योंकि
वह नहीं रह जाएगी
पहले भी कब थी ?
इस घर के लायक।

अलबत्ता
‘बुश’ मेरा कुत्ता
शायद ‘मिस’ करेगा
सुबह सुबह
मेरे साथ टहलना।
क्योंकि कोई और उसे
बाहर नहीं ले
जाता अल सुबह ;
पर शायद
उसके बरामदे का फर्श
खराब करने की आदत
से तंग आकर
पत्नी संभाल लेगी ;
यह काम भी,
और बुश भी
भूल जाएगा
मेरा दुलारना डाँटना दोनों

क्या फर्क
पड़ता है
मेरे जीने से
या मरने से ?
जीते जी मैं
बोझ नहीं हूँ

धरती पर
और मेरे मरने से
दुनिया नहीं है
खाली होने वाली
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न ही अपनी मर्जी से मर पाया मैं।

5:54 AM
मां एक याद
मां
ने
बहुत सरल
बहुत प्यारी
बहुत भोली
मां ने
बचपन में
मुझे
एक गलत
आदत सिखा दी थी
कि सोने से पहले
एक बार
बीते दिन पर
नजर डालो और
सोचो कि तुमने
दिन भर
क्या किया
बुरा या भला
सार्थक
या
निरर्थक
मां तो चली गई
सुदूर
क्षितिज के पार
और बन गई
एक तारा नया
इधर
जब रात उतरती है
और नींद की
गोली खाकर
जब भी
मैं सोने लगता हूं
तो
अचानक
एक झटका सा लगता है
और
मैं सोचते बैठ जाता हूं
कि दिन भर मैंने
क्या किया?कि
आज के दिन
मैं कितनी बार मरा
कितनी बार जिया
फिर जिया
इसका हिसाब
बड़ा उलझन भरा है
मेरा वजूद जाने कितनी बार मरा है
यह दिन भी बेकार गया
मैंने देखे
मरीज बहुत
ठीक भी हुए कई
पर नहीं है
यह बात नई
इसी तरह तमाम जिन्दगी गई
जो भी था मन में
जिसे भी माना
मैंने सार्थक
तमाम उम्र भर
वह आज भी नहीं कर पाया मैं
न तो कभी
अपनी मर्जी से जिया
न ही
अपनी मर्जी से मर पाया मैं।
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मेरे गम बेचारे कहां जायेंगे

8:24 AM


डॉक्टर ने
सरगोशी के लहजे में कहा
सुनो !
एक दिल में
चार वाल्व होते हैं
और
तुम्हारे दो वाल्व खराब हैं
दो वाल्व
माने आधा -दिल
अब तुम्ही कहो
इस आधे दिल में
किसे रक्खूं
तुम्हें या अपने गमों को
तुम्हें तो
स्वस्थ शरीर व जवां दिल
मिल जाय़ेंगे
मेरे गम
बेचारे कहां जायेंगे
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